संस्कार
नताशा की शादी को अभी कुछ ही समय ही हुआ था। वह एक अत्यंत साधारण परिवार से थी।उसके पिता सरकारी महकमे में क्लर्क थे।उसकी शादी में उन्होंने अपनी हैसियत से कहीं अधिक धन खर्च किया था। अभी उन्हें एक बेटी का और विवाह करना था।
नताशा के लिए रिश्ता उसके चाचाजी लाए थे।लड़का अच्छे परिवार से था।कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था।अच्छा कमा लेता था।
चाचाजी ने परिवार के साथ मीटिंग फिक्स करवा दी।पहली ही बार में उन्हें नताशा पसंद आ गई।नताशा को भी वरुण अच्छा लगा।जल्द ही शादी की तिथि भी फिक्स हो गई।
वरुण के पिता,अशोक एक बड़ी कंपनी में मैनेजर और मां ,सुप्रिया एक गृहिणी थीं। रुतबा भी उनका नताशा के परिवार से बड़ा था।वो चाहते थे कि शादी उन्हीं की हैसियत के अनुसार हो ।नताशा के पिता विनोद माथुर ने हामी भर दी।
हर तीसरे दिन अशोक घर आते और शादी की तैयारियां देखते।फिर कोई नई फरमाइश रख देते।
वह कहते," माथुर साहब ,खाने के साथ दस प्रकार के मीठे ज़रूर हो। आइसक्रीम और शेक,जूस तो होंगे ही।आगे आप खुद ही समझदार है।"
एक दिन वरुण के माता - पिता नताशा के घर आए और कहा कुछ ज़रूरी बात करनी है। साथ ही समान की एक सूची पकड़ा दी।इसमें फ्रिज, एल इ डी, डायनिंग टेबल, दुरियन का सोफ़ा आदि के नाम थे।साथ ही गहने की लिस्ट अलग थी।
वापिस जाते हुए अशोक बोले,"अब माथुर साहब ये सब आपकी बेटी का ही है। उसी के सुख के लिए है ये सब।वरना हमारे पास भगवान का दिया सब कुछ है।""
विनोद जी ने कहा,"जी बिल्कुल।"
उनके जाते ही विनोद ने घर के काग़ज़ उठाए और उनको गिरवी रख कर पैसे लेने चले गए। नताशा की मां ने ये करने से मना किया और कहा,"आप उनको मना कर दीजिए। कह दीजिए कि हम ये सब नहीं से सकते।" पर विनोद ने नहीं सुनी।पता नहीं क्या क्या दाव पर लगाया गया इस शादी के लिए।
आखिरकार शादी हो ही गई। नताशा ससुराल आ गई। उसने एक अजीब सी कुंठा उत्पन्न हो चुकी थी।खुश होकर भी वह खुश नहीं थी। वह अपने उन माता पिता के लिए सोच रही थी जो इस समय कर्ज में डूब चुके थे।अपने आप को कोस रही थी,"मैंने क्यों आवाज़ नहीं उठाई?क्यों नहीं कहा मैने कि मुझे ऐसी शादी नहीं करनी जिसमे आप पर इतना बोझ हो जाए ?"
इस बोझ से नताशा जी नहीं पा रही थी।शादी के आरंभ के कुछ दिन ठीक था ।पर धीरे - धीरे नताशा ने अपने तेवर और रंग दोनों बदलने शुरू कर दिए ।बात बात में जवाब देने लगी।
एक दिन वह सुबह आठ बजे उठी।उसने सुप्रिया से कहा,"मम्मी प्लीज़ एक कप चाय बना दीजिए।" सुप्रिया को ऐसी उम्मीद कदापि नहीं थी।उसने बदले में कह दिया,"खुद बनाओ बेटा।"
अक्सर सास बहू के बीच नोंक झोंक होने लगी।नताशा का कोई भी जवाब झट से आ जाता था जिस से सुप्रिया को क्रोध आने लगा।
उसने वरुण से बात की और कहा,"वरुण तू नताशा से बात कर।बहुत बत्मीजी से बात करती है।बहुत मुंह फट है।संस्कार तो जैसे इसको माता पिता ने दिए ही नहीं है।"
वरुण ने कहा," उससे मैं बात करता हूं मां।"
वरुण कमरे में आया और नताशा से बोला,"मां कह रही थी तुम उनको जवाब देंने लगी हो। तुमने उनसे बतमीजी से बात की ।"
नताशा ने जवाब में कहा,"ओह तो मेरी बाहर शिकायत हो रही है।आप दोनों कॉफ्रेंस कर रहे थे मेरे खिलाफ।"
वरुण क्रोध में आकर बोला,"नताशा, यह क्या बकवास है?"
नताशा इसके बाद चुप ही गई।कुछ दिन दोनों की बात ही नहीं हुई।
कुछ दिन फिर सुप्रिया और नताशा में कहासुनी हो गई।सुप्रिया ने गुस्से में कहा,"यहीं संस्कार हैं तुम्हारे।माता पिता ने यही सिखाया तुम्हें।बिना संस्कारों के ही ससुराल भेज दिया।शर्म नहीं आती बड़ों को जवाब देती हो।"
अब नताशा के सब्र का बांध टूट गया।वह बोल पड़ी,"संस्कार...?? कौन से संस्कार मम्मी? वो तो आपने मांगे ही कहां थे? याद है या भूल गए आप? शादी के 5 दिन पहले जो लिस्ट आपने दी थी समान की ,उसने संस्कारों का नाम तो था ही नहीं। अपने दहेज के साथ आने को कहा था ।संस्कारों के साथ नहीं।"
आगे वह रोती हुई बोली,"आप की मांगों को पूरा करने के लिए जब मेरे पापा ने घर के काग़ज़ और मां ने अपने गहनों को गिरवी रखा था तो उसी समय मैने अपने संस्कारों को भी गिरवी रख दिया।"
किसी के पास कोई जवाब नहीं था।
क्या ज़रूरी है --- संस्कार या दहेज ?