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POETRY
जब पत्तों और फूलों में रंग होते हैं,
तो इंसानों में क्यों न हो?
जब तीखी धूप का असर धरा सूखा देती है,
तो तीखी बातों के खंजर से दिल छल्ली क्यों न हो ?
जब मेघ बरस के अपना बोझ हल्का कर देती है,
तो बातों के तीर से दिल पिघले और आँसुओं से मन हल्का क्यों न हो?
जब जाड़े का गौसम ठिठुरन ला देता है
और एक नर्म चादर की गरमाहट को मन तरस जाता है,
तो लोगों के बिछड़ने पर किसी के साथ की कशिश क्यों न हो?
पतझड़ में भी तो पत्ते टूट जाते हैं,
तो बातों के वार से दिल के टुकडे़ भी क्यों न हो?